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गुजरे जमाने के नेता और राजनीति..

ये रहे गुजरे जमाने के नेता हर समय देश में अच्छे-बुरे नेता होते हैं। गुज़रे जमाने में भी रहे। उस जमाने में मीडिया इतनी सक्रिय नहीं था...


ये रहे गुजरे जमाने के नेता

हर समय देश में अच्छे-बुरे नेता होते हैं। गुज़रे जमाने में भी रहे। उस जमाने में मीडिया इतनी सक्रिय नहीं था। दूरदर्शन काएक ही चैनल था ओर उस पर एक बार ही सलमा सुल्तान ख़बरे पढ़ती थी। इस ज़माने में तो न्यूड चैनलों की गिनती ही नहीं है। जो बेसिर, पैर की बहस पहले कभी-कभी चाय की दुकानों पर ही होती थी, वो अब चैनलों पर नियमित होती है।
जैसे आजकल केजरीवाल, राहुल गांधी, सिब्बल, सुरजेवाला, दिग्विडय, संजय राउत, साक्षी महाराज आदि नेता है, ऐसे ही उस जमानें में भी कई नेता थे। उस जमानें के नेताओं में बाबू जगजीवन राम, कमलापति त्रिपाठी,राजनारयण, बानरसीदास, राममनोहर लोहिया, चौधरी चरणसिहँ, चन्द्रशेखर, मोरार जी देसाई, मधुलिमये जैसे नेताओ का नाम याद आता है।

ये रहे गुजरे जमाने के राजनैतिक किस्से
quotes 


लोग इऩ्हें इनके आदर्शों को लेकर याद करते हैं। राजनारायण को इनमें सबसे ज्यादा याद किया जाता है। उनके राजनैतिक जीवन के कई किस्से मशहुर है। वें लोहिया को बहुत मानते थे। राजनारायण को इंदिरा गांधी को हराने वाले नेता के रूप में भी याद किया जाता है। राजनारायण के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा दिन आया था सितम्बर 1958 में, जब उन्होंने अपने समाजवादी साथियों के साथ उत्तप्रदेश विधानसभा में ऐसा हंगामा मचाया था कि उनको सदन से निकलवाने के लिए पहली बार हेलमेट लगाए पुलिसकर्मियोंको सदन के अन्दर बुलाना पड़ा था। राज नारायण ने अपने साढे तीन मन वजन को जमीन पर डाल दिया था ओर पुलिस वालों को बाकांयदा उन्हे खीचकर खसीटते हुए सदम से बाह ले जाना पड़ा था। जब वो विधानसभा के मुखय् द्वार तक खींच कर लाये गये, जब तक उनके सारे कपड़े फट चुके थे ओर उनके जिस्म पर सिर्फ एक लंगोट बचा था।

गुजरे जमाने में हुआ करते थे महत्वपूर्ण उसूल

राजनारायण  के राजनैतिक गुरु थे राम मनोहर लोहिया। कहते  हैं जो रिश्ता राम ओऱ हनुमान का था  वो ही लोहिया ओर राज नारायण के बीच का था। लेंकिन एक बार राम मनोहर लोहिया भी राज नारायण से नाराज़ हो गये थे। जब राज नारायण राज्यसभा में आए , तो उस समय लोहिया की राय थी कि जो लोग लोकसभा का चुनाव हार गए हों, उन्हें राज्यसभा या विधान परिषद में नही आना चाहिये उसको वो पिछला दरवाजा मानते थे। वो खुद 1957 ओऱ 1962 का चुनाव हारे थे, लेकिन उन्होने राज्य सभा के जरिये संसद पहुंचने से इनकार कर दिया था। उस जमाने के नेताओं के उसुल हुआ करते थे।

राजनारायण ने जब हाईकोर्ट में इन्दिरां गाधी को चुनौती


1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने राज नारायण को एक लाख से भी अधिक वोटों से हराया था। लेकिन राज नारायण ने इसे अदालत में चुनौती दी ओर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा का चुनाव अवैध घोषित कर दिया ओर उन पर छह सालों के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया।



गुजरे जमानें में लगा था आपातकाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का नतीजा ये रहा कि इंदिरा गाधी ने आपातकाल की धोषणा कर दी ओर विपक्ष के सभी नेताओं को जिसमें राज नारायण भी शामिल थे, गिरफ्तार कर लिया गया। 1977 के चुनाव में आपातकाल की ज्यादतियों ओऱ जबरन नसबंदी के कारण फिजा इंदिरा गांधी के खिलाफ हो गयी। लेकिन कोई ये कल्पना नहीं कर रहा था कि इंदिरा गांधी खुद अपना चुनाव हार जायगी। राज नारायण चुनाव जीते। मोरार जी देसाई में जनता मंत्रिमंडल में उन्हे स्वास्थय मत्रीं बनाया। लेकिन एक साल के भीतर ही मोरार जी देसा उन्हें अपने मंत्रिमंडल से हटा दिया गया।

गुजरे जमानें में रहे जयप्रकाश नारायण प्रमुख नेता


गुज़रे जमाने के नेताओं में जयप्रकाश नारायण को भी याद किया जाता है। जयप्रकाश नारायण लोकतंत्र को दोष मुक्त बनाना चाहते थे। वो धनबल ओर चुनाव के बढ़ते खर्च को कम करना थे। ताकि जनता का भला हो सके। साथ ही जयप्रकाश नारायण का सपना एक ऐसा समाज बनाने का था, जिसमें नर-नारी के बीच समानता हो ओर जाति का भेदभाव न हो। ऐसे में जब गुजरात ओर उसके बाद बिहार के विधार्थियों ने उनसे नेतृत्व संभालने का आग्रह किया, तो उनकी आंखों में चमक- आ गई थी ओर उऩ्होंने सम्पूर्ण क्रातिं का आह्वान कर दिया था।

जय प्रकाश नारायण के सामाजिक आन्दोलन

जेपी का आन्दोलन भ्रष्ट्राचार के विषय पर शुरू हुआ था। बाद में इसमें बुहत कुछ जोड़ा गया ओर यह सम्पूर्ण क्रान्ति में परिवर्तित हो गया ओर व्यवस्था परिवर्तन की ओर मुड़ गया। इसके तहत जेपी ने कहा  था कि यह आन्दोलन समाजिक न्याय, जिति व्यवस्था तोड़नें, जनेऊ हटाने, नर-नारी समतां के लिए है।बाद में इसमें शासन, प्रशासनका तरीका बदलने, राइट टू रिकालँ को भी शामिल कर लिया गया।  वह अंतरजातिय विवाह पर जोर देते थे। ऐसे में जब  जेपी ने 5 जून 1974 के दिन पटना के गांधी मैदान में ओपचारिक रूप से सम्पूर्ण क्रातिं की घोषणा की। इस क्रांति का मतलब परिवर्तन ओर नवनिर्माण दोनों से था। हालाकिं एक व्यापक उदेश्य के लिए शुरू हुआ जेपी का सम्पूर्ण क्रातिं आन्दोलन बाद में दूसरी दिशा में मुड़ गया।



बाबू जगजीवन गुजरे जमाने के उत्कृष्ट नेता


बाबू जगजीवन राम भी गुज़रे जमाने के अच्छे नेता थे। जगजीवन राम भारत के प्रथम दिलत उप प्रधानमंत्री थे। सासाराम से पुननिर्मित बाबू जी वर्ष 1956-62 तक रेल मंत्री रहे। उन्होने रेल मंत्री के रूप में भारतीय रेलवे का काया पलट ही कर दिया । उन्होंने रेलवे अधिकारियों , अफसरों व कर्मचारियों के विकास पर अधिक बल दिया।



गुजरे जमाने से मिले कुछ प्रभावी नेता

उनकी बेटी श्रीमति मीरा भी अच्छी नेता हैं। राजनीति में उनका प्रवेश अस्सी के दशक में हुआ था। 1985  में वे पहली बार बिजनौर से संसद में चुन कर आई। उस समय के दो दलित नेता रामविलास पासवान ओर मायावनती भी उनके प्रचार अभियान का हिस्सा रहे। वह लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष के रूप में 3 जून 2009 को निर्विरोध चुनी गयी। इन्होंने 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए की उम्मीदवार के रूप में रामनाथ कोविन्द के विरुद्ध चुनाव लड़ा जिसमें वे 34 प्रतिशत मतों से पराजित हुई।

किसी शायर ने कहा है-

सच्चे सीधे काम भी अब उल्टे सीधे हो गए,
आस्था के दर पे कैसी कोशिशे चलने लगी।
उसके दर पर जा रहा है, फिर भी दौलत का नशा,
मज़हबी कामों में भी अब रिश्वते चलने लगी।

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